Mrityu – मृत्यु
मृत्यु के बाद
अंतरिक्ष अवश्य बन जाता है
चेतना का अपना संसार
जहां अपने में समाहित करने को
आतुर होते हैं ब्रह्म मेरे निराकार
विषाणु कर के काया को बेजान
हो जाते हैं
सर्वत्र शरीर के भीतर
विद्यमान
मृत्यु , मृत्यु नहीं
अनगनित जीवाणुओं पर
अनगनित विषाणुओं की है ये जीत
गूंजता है शरीर के भीतर
पीड़ा का गीत
शरीर हो जाता है शीत
विषाणुओं से हो जाती है
उसको प्रीत
मेरे शरीर को
बना डाला विषाणुओं ने अपना डेरा
छा गया चहुं दिशाओं में गतिहीन अंधेरा
कहता है जग उसे मृत्यु का पहरा
विषाणुओं की जंजीर में
कैद काया को
नष्ट करने में मत लगाओ अब देर
निभाया था जिन्होंने
मिलकर मेरे जीवन के संग
अपना पूर्ण बैर
चिता पे सुला कर
कर दो शत्रु को राख़
जीवित ना रहे भूल–चूक में
एक भी शत्रु शेष
मृत काया में
उपाय कर के अपने लाख
सलामत रहेगी
शत्रुओं से
जीवन– वट की हर साख
निराकार की महिमा का
गुणगान करेगी
अंतर्मन की हर आंख।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)

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