Kahta Hai Tu Mujhe Bhagwan!- कहता है तू मुझे भगवान !



कहता है तू मुझे भगवान !

उठती है तेरी मंदिर से पुकार

करता है मस्जिद से तू अज़ान 

गुरु द्वारे से होती गुरु वाणी

गिरिजाघर से होती है प्रार्थना का गान

अलग –अलग बना दिए तूने मेरे स्थान


मैं हूं भगवान पर मुझे भी होती है थकान

कब तक अलग –अलग स्वीकार  करूं 

मैं अपने रहने का स्थान 

मुझे भी चाहिए तेरी तरह 

मन में तेरे अपना मकान

खाना चाहता हूं तेरे संग–संग स्वादिष्ट पकवान


बंद करना चाहता हूं 

अलग –अलग  होने का घमासान 

बने मेरी व्यापकता 

सृष्टि के लिए एक वरदान 

सही मायने में कहलाऊंगा

तभी तेरा भगवान 


होऊंगा मै गौरवान्वित 

श्रेष्ठ कृति है मेरी इंसान

जिसके मन में है मेरा मकान

होगी दूर मेरी  जहां थकान

उसकी समग्र समानता 

देगी मुझे विश्व व्यापक पहचान

मिलकर गायेंगे सदभाव का गान

बढ़ेगा मेरा चहुं दिशाओं में मान


सृष्टि के कल्याण के लिए 

सहयोग का करेंगे सर्व जन दान

अस्त्र और शस्त्र 

नहीं भरेंगे अब उड़ान

शांत पथ पर चलेगा विज्ञान

करूंगा  मै तेरे मेरे होने पे  गुमान 

कहता है तू मुझे भगवान!


मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)

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