Meri Dar Nahin Hai Dar –मेरी दर नहीं है डर
मेरी दर नहीं है डर अन्तर के तम को लूँगा मैं हर मैं नहीं चाहूंगा तू दीन हीन होकर मांगने के लिए आगे बढ़ाए अपने कर अजगर को भूखा रहने नहीं देता आलस्य की पराकाष्ठा में भोजन देता हूं उसे पेट भर तू तो आखिर है नर प्रकृति का पोषण करेगा तू सर्व श्रेष्ठ बुद्धि जीवी होने का मिला है तुझे परम पिता परमेश्वर के द्वारा प्रकृति पर शासन करने का वर बनाए तू हथियार प्रकृति पे खाएं तू खार निर्दोष का बने तू काल सौदा करके हथियारों का बने तू मालामाल ऐसा करने को दी नहीं मैने तुझे नर की खाल करके धरा को बर्बाद हो जाना चाहता है पर ग्रह पर आबाद ये कैसा है तेरी बुद्धि का स्वाद ? जो छोड़ कर जाना चाहता है मेरी धरा में भरकर असाध्य मवाद अन्तर ही अन्तर पैदा करके पैदा कर दिए धरा पर तूने सीमाओं के विवाद कर कृपा मुझ पर शान्ति से रहे धरा पर नारी और नर इसे ही मानूंगा तेरा मेरे प्रति निष्काम आराधना में बढ़ा मेरी ओर तेरा कर गौरवान्वित होऊंगा बना कर अपनी श्रेष्ठ कृति नारी और नर मेरी दर नहीं है डर अन्तर के तम को लूँगा मैं हर । ...