Sambhal–सम्भल
एक सम्भल की धरा में संयम से गौकर्ण सा पला श्री कल्कि को अपने भीतर पाया खड़ा दूजा सम्भल की धरा में असंयम से दुंदुभी सा पला उसने पाया कलि पुरुष को भीतर खड़ा धर्म की स्थापना हेतु दोनों में युद्ध हुआ बड़ा श्री कल्कि की हुई जीत कलि पुरुष सर्व जन से भाग निकला चहुं दिशाओं से बिगुल बजा संयमित को मिलती नहीं कभी कोई सजा। मौलिक रचयिता :–नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत )







