Varan- वरण
प्रकृति का कर वरण अमर होगा तेरा मरण सत्य पथ पर धर चरण कर परम का दर्शन दूर नहीं पास हूं आकर तो देख मेरी शरण क्यों करता है बात ही बात में तू रण ? तय है मिलना मृत्यु फल देख रेख करते हैं मेरे सदा नयन भेजा है तुझे धरा पर देकर मुट्ठी में आत्मबल कर सके तू अपना पालन पोषण मनुज ही मनुज की उपज एक दूझे को गले लगाने में कैसा हर्ज़ ? काम आना एक दूसरे के बना अपना फ़र्ज़ मलहम बनेगा तू तेरा भले ही कोई हो तुझे मर्ज़ उतर जाएगा जन्म जन्म का कर्ज़ मृत्यु लोक की है अपरिमित माया मृत्यु फल को चखने हेतु मैं ही तुझ में समाया कृत्रिम मृत्यु ने मुझे तुझसे दूर भगाया भीतर ही भीतर तेरे संग मै भी छट पटाया चहुं दिशाओं में छाया भय का साया देकर जन्म तुझे मैं पछताया मत कर तू भले ही तू मेरा स्मरण पर कर प्राकृतिक मृत्यु का वरण सौंप दे मुझे अपने आपको बन कर पुष्प फल पंथ ही पंथ के भेद का रख मत गरल तेरे को मेरी प्राप्ति होने दे सरल । मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)