Hey Dhara ! Ro Mat - हे धरा ! रो मत
हे धरा ! रो मत कलावतार ! आयेंगे दुर्योधा: कलि ! स्वत: छोड़ेगा तेरी बलि उसके मुँह में पहुंचेगी पतित पावनी मां गंगा के जल प्रसाद से उत्पन्न गन्ने के रस से बनी गुड़ प्रसाद की डली कलावतार की देख कला मनुज को मिला था जग हरा भरा भूला उन्हें आईं विपदा भारी विचलित होकर भटक रहे नर और नारी विवेक को दिशा दे रहा सदियों से ध्रुव तारा मंज़िल को पाने में भटके नहीं धरा का कोई मनुज मारा –मारा एक को एक से जोड़ कर कलावतार ने जग का भार अपने ऊपर ले लिया सारा सत्ता पे तू मत बैठ समझ बैठा हुआ है जो सदा रहता कण –कण में वो और कोई नहीं ब्रह्मांड नायक है कलावतार ! जो समदृष्टि से चलायेंगे संपूर्ण ब्रह्मांड के भीतर अपनी सरकार बारूद पे लगेगा चहुं दिशाओं में ताला सबका सबके साथ होगा समान व्यवहार विषम परिस्थितियां बनेगी स्वतः सम जग का होकर जग के खिलाफ जंग से नहीं दिखायेगा कोई अपना पराक्रम हरेक हर प्राणी की भलाई के लिए आज से उठाएगा अपना हर कदम कलावतार को बैठा कर हर दम हे धर...







