Varan- वरण
प्रकृति का कर सदा वरण अमर होगा तेरा जीवन सत्य पथ पर धर चरण कर परम का दर्शन दूर नहीं पास है परम तेरे ! आकर तो देख उनकी शरण मनुज है परम की परम उपज एक दूझे को गले लगाने में फिर कैसा हर्ज़ ? काम आना एक दूसरे के बना अपना फ़र्ज़ मलहम बनेगा तू तेरा भले ही कोई हो तुझे मर्ज़ उतर जाएगा जन्म जन्म का कर्ज़ चहुं और विस्तृत है परम की माया अपनी छबि का दर्शन मनुज में पाया गिर कर जब तू उठा मन ही मन परम ने तुझे अपनाया कर सदा तू परम का स्मरण करेंगे तेरी कमजोरी का हरण प्रिय आजा उनकी शरण करेंगे तेरा सदा मार्ग दर्शन सौंप दे उन्हें अपने आपको बन कर पुष्प फल रख मत चित में माया का गरल प्रकृति का कर सदा वरण इतिहास में होगा तेरा वर्णन । मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)