Supno--सुपनो

 


जैसल धौरा में म्हाने आकरो ताव आ ग्यो सा,

आख़िरी बैल्या में थांके गोड़ा रो सिरहाणो लेके,

मन री बात थांसूं कहबा रो चाव ला ग्यो सा।


ऊँट पे होके सवार भेगा पधारो सा,


किण पत्तो किण घड़ी हंसलो निकल जावे,

थांसूं मिलबा रो
सुपनो,

सुपनो बन के रह जावे सा।


मौलिक रचयिता: नरेंद्र सिंह राठौड़, जयपुर (भारत)

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