Man Ke Kapat Khol– मन के कपाट खोल



मन के कपाट खोल 

बोल हरि बोल

उस मन  का नहीं कोई मोल

जिसका पल पल  हो रहा

आसक्ति के कारण डांवाडोल 


भक्ति रस से आनंदित हो रहे कपोल

हरि आए जब भीतर तेरे

प्यारे ना मत बोल

तेरे मन में दस्तक देगी भोर 

कुंठा का नहीं होगा शोर 


मच रही आगे बढ़ने की होड़ 

फैसला क्यों ले रहा

प्रकृति के नियमों को तोड़ मरोड़ 


जलवायु परिवर्तन को चुपचाप देख रहा

विनाश की ओर अंधा होकर

लगा रहा तू घुड़दौड़ 

ये कैसी तेरी होड़ 

है नहीं जहां मानवता को कोई ठौर 


हर जान को खतरा है

हथियारों में मची होड़

बिकने लगा असत्य तराजू में तोल

मानवता पर कर नहीं  रहा कोई गौर 


हो रहा है चहुं दिशाओं में 

क्रंदन का शोर 

होने दे भोर 

मन के कपाट खोल

बोल हरि बोल ।


मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)

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