Agariya –अगरिया

अगरिया का दर्द गहरा है

जीवन के इर्द–गिर्द 

नमक का पहरा है

दुःख का  है

इतना ढेर

मरता है जब 

अगरिया

चिता की अग्नि में

जलते नहीं उसके पैर

नमक निभाता है

उसके संग कालजयी बैर

फिर भी 

रखता है

जठराग्नि को मिटाने 

के लिए 

नमक की खेती में

पीढ़ी दर पीढ़ी 

अपना पैर

कब जागृत होगी

सत्ता 

हाथों में होंगे

उनके दस्ताने 

पैरो में होगा जूता

ताकि अंतिम बेला पर

अगरिया का पैर

अग्नि से रहे ना पाए अछूता।


मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)

Comments