Barood pe khana pak raha hai–बारूद पे खाना पक रहा है
बारूद पे खाना पक रहा है
कलेजा बन के कठोर धधक रहा है
दिखाने अपनी ताकत को
तेल के कुओं में आग लगा रहा है
हवा में जहर बड़े जोर से घोल रहा है
डरा डरा कर अपनी झोली में आने को
हथियार हाथों में दे रहा है
मिटाने को मानवता को
जंग में जोर से धकेल रहा है
बारूद पे खाना पक रहा है
बाजार के बीच धुंआ उठ रहा है
लिए बच्चों को गोद में घर की ओर
हर कोई भाग रहा है
देखा घर तो घर में धुंआ उठ रहा है
बारूद पे खाना पक रहा है
झुलसे शरीर को लेकर
अस्पताल की ओर भाग रहा है
बचाने वाला डॉक्टर अपनी जान बचाने
बाहर की ओर दौड़ रहा है
ताकत के खेल में हर कोई नाग पाल रहा है
कोई किसी का अब हाल नहीं पूछ रहा है
बारूद पे खाना पक रहा है।
मौलिक रचयिता :– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत )


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