Bojhil Aankhein – बोझिल आंखें
तेरे आने की
आहट भर से
मां – बाप
फूले नहीं समाते थे
तू चैन से
सो सके
रात भर जगा करते थे
तेरे सपनों को
पूरा करने के लिए
खून पसीना
बहाया करते थे
शादी क्या हो गई
परिवार क्या बस गया
आज मां – बाप
की आंखे
तेरे लिए
बोझिल
हो गई है
तेरा कलेजा क्यों ना कांपा
जो उन्हें
वृद्धाश्रम
की दहलीज पर छोड़ कर
जरा– सा
शर्मिन्दा नहीं
हो रहा है
तेरे संग रहने को
आतुर
बोझिल आंखों की
तड़प को
तू क्यों नहीं
समझ रहा है?
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)



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