Diyaslai – दियासलाई
कहने को तुम हो दियासलाई
गई परमेश्वर के निकट
छूकर दीपक की बाती को
बन कर चेतना
अंतर्मन की पीड़ा को
हरने की आस तुम्हीं ने जगाई
कहने को तुम हो दियासलाई
पहुंची जब चूल्हे के पास
ओढ़े हुए मुख पर बारूद को
बारूद से घर्षण कर
चूल्हे में आग लगाई
लेकिन वो आग, आग ना थी
जिसने चूल्हे पर
आंच जगाई
उत्सव के पलो में
बनाने को पकवान
कड़ाई चढ़वाई
बना है आज हलवा
खा खाकर
बच्चों के मुख पर
खिलखिलाहट
तेरे ही कारण छाई
कहने को तुम हो दियासलाई
आज अलख बनकर
हाथों में ली हुई मशालों में
निकली तुम्ही से न्याय की ज्योति
जिसके भीतर
चिनगारी तुम्ही से आई
जो सत्ता दबाकर रुई
अपने कानों में
ले रही थी कुंभकरण – सी निद्रा
उन्हें उससे जगा कर
फर्ज की याद बस तूने ही दिलाई
कहने को तुम हो दियासलाई
मगर आज तुम इस नाम से
बड़ी हो और भी ज्यादा बड़ी
पीड़ितों को दिलाकर न्याय
पहना दी तुमने
अलख से अपनी
ज़ालिम के हाथ में हथकड़ी
जुल्म के खिलाफ
उठने वाली बनी हो
एक मात्र तुम छड़ी।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)



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