Chaar Deewarein Nahin Hain, Hai Yah Mera Ghar-चार दीवारें नहीं हैं, है यह मेरा घर
चार दीवारें नहीं हैं,
है यह मेरा घर
महफूज़ महसूस करता हूं
पाक पांव मेरे
अन्दर धर – धर
चार दीवारें नहीं हैं ,
है यह मेरा घर
छानी हैं जिन्दगी ने
कई दर
मगर हर दर ने स्वागत किया डर – डर
थी दिल में कसक यही
मेरा घर
क्यों नहीं था वहां
जहां हाथों को फैला कर
छू सकूं अपना आसमां
चार दीवारें नहीं हैं,
है यह मेरा घर
महफूज़ महसूस करता हूं
पाक पांव मेरे
अन्दर धर – धर
चार दीवारें नहीं हैं ,
है यह मेरा घर
दिल में नहीं था मेरे
कोई चोर
फिर भी कर रहा था
अपनी मासूमियत से बोर
चला जाए तो अच्छा है
कानों में आ रहा था शोर
मैंने किया अपना बोरिया बिस्तर गोल
चल मेरे मन घर की ओर
चार दीवारें नहीं हैं,
है यह मेरा घर
महफूज़ महसूस करता हूं
पाक पांव मेरे
अन्दर धर – धर
चार दीवारें नहीं हैं ,
है यह मेरा घर
याद आता है
अब मुझे वो मेरा बचपन
गीली मिट्टी से
बने घर में भी देखा करते थे
सुंदर स्वप्न
उठता है मन में प्रश्न
बड़ा होकर इंसा
क्यों कर देता है उन्हें दफ़न
चार दीवारें नहीं हैं,
है यह मेरा घर
महफूज़ महसूस करता हूं
पाक पांव मेरे
अन्दर धर – धर
चार दीवारें नहीं हैं ,
है यह मेरा घर ।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)

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