Ghas Phoons Ki Jhonpadi Meri – घास– फूंस की झोपड़ी मेरी

घास– फूंस की झोपड़ी मेरी 

सोना – चांदी मेरे पास कहां?

चोर आकर यहां

प्याज से 

रोटी संग मेरे खा कर

इन्सान बन कर जाते हैं 

और 

राम  का नाम लेकर

मुझ से भाव पूर्ण

विदा ले जाते हैं 

आते हैं 

इस देहलीज पर पुनः 

 तो लेकर

हाथ में फावड़ा और गैंती 

कुछ क्षण हो कर प्रसन्न 

मेरे पास रुक कर 

पोटली में से

अपने 

निकाल कर

गर्मागर्म हलवा 

मेरी थाली में 

धरते  हैं 

कहते हैं मुझ से

आओ बन्धु !

मिल– बांट कर

संग खाते हैं 

अब बन गए 

मेहनतकश हम 

अब धन नहीं

परिश्रम से दिल जीत कर 

जाते  हैं

 तथा 

अपने अतिरिक्त समय को

किसी  की भी 

घास – फूंस की झोंपड़ी को

संवारने में लगाते हैं।


मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)

Comments