Kahne Ko Bheed Hai–कहने को भीड़ है
कहने को भीड़ है
भीड़ में हरेक अकेला है
इस अकेले ने ही अकेले को
संसार के झंझावात में
आगे कदम बढ़ाने को धकेला है
बादल से बरसती बूंदे
शुरुआत में गिरती अकेली है
अनवरत झमाझम धरा पर गिरती है
कही नाला कहीं दरिया बनकर
बनकर भीड़ का हिस्सा
एक अकेली
सागर में
सिमट कर रह जाती है
कहने को भीड़ है
भीड़ में हरेक अकेला है
इस अकेले ने ही अकेले को
ससार के झंझावात में
आगे कदम बढ़ाने को धकेला है
गगन में उड़ान भरते हैं
पंछी अकेले
हवा को चीरते जाते
एक ही पथ की ओर
जब एक –दूझे को धकेले
बन कर भीड़ का हिस्सा
चराचर जगत में रहते सदा अकेले
कहने को भीड़ है
भीड़ में हरेक अकेला है
इस अकेले ने ही अकेले को
संसार के झंझावात में
आगे कदम बढ़ाने को धकेला है
सागर में रहती है मछली
मछली संग मछली
भीड़ में अटखेलियां
भरती है अकेले
लगते हैं सागर में
जीवन के मैले
रहती है सदा
एक – दूसरे को घेरे
कहने को भीड़ है
भीड़ में हरेक अकेला है
इस अकेले ने ही अकेले को
संसार के झंझावात में
आगे कदम बढ़ाने को धकेला है
हरेक है अकेला
सिखाती है मृत्यु
डाल कर अपना डेरा
भीड़ साथ छोड़ देती है
करके सहसा अकेला
कहने को भीड़ है
भीड़ में हरेक अकेला है
इस अकेले ने ही अकेले को
संसार के झंझावात में
आगे कदम बढ़ाने को धकेला है।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)


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