Salvatein-सलवटें
मेहनतकश की ज़िंदगी का
क्या पूछिए फ़लसफ़ा
कमीज़ पे सलवटें आती नज़र बेहिसाब हैं।
"आज काम मिल जाए तो अच्छा है,
हो जाए दाल-रोटी का इंतज़ाम –
शुक्रिया आपका, उसका जनाब है।"
मेहनतकश की ज़िंदगी का
क्या पूछिए फ़लसफ़ा
कमीज़ पे सलवटें आती नज़र बेहिसाब है
बच्चों के लिए ले जाएगा आज पानी-पूरी,
खाते हुए देखकर उन्हें होगा वो फिर प्रसन्न,
होगी दूर थकन उसकी इक पल में तमाम है।
मेहनतकश की ज़िंदगी का
क्या पूछिए फ़लसफ़ा
कमीज़ पे सलवटें आती नज़र बेहिसाब हैं।
हो गया आज वो बूढ़ा !
कमीज़ की सलवटें बन गई हैं अब चेहरे की झुर्रियाँ,
चेहरे पे उसके अमीरों सा
छिपाने को प्लास्टिक सर्जरी का नहीं कोई नक़ाब है।
मेहनतकश की ज़िंदगी का
क्या पूछिए फ़लसफ़ा
कमीज़ पे सलवटें आती नज़र बेहिसाब हैं।
मौलिक रचयिता:- नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)



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