Vikarn –Ek yoddha:विकर्ण– एक योद्धा
भरी सभा में द्रोपदी का
चीर हरण हो रहा था
एक अकेले कौरव के हृदय को
ये दृश्य अन्दर ही अन्दर
चीर रहा था
जो रोकने के लिए
सिंह की भांति दहाड़ रहा था
उस पर हस्तिनापुर गौरव कर रहा था
उसके दिल की करुण पुकार
भीतर बैठा परमात्मा
द्रौपदी के हृदय के संग
सुन रहा था
आकर केशव ने
बढ़ाया चीर
विकर्ण ने धरा धीर
केशव ने मन ही मन कहा
भरी सभा में
विकर्ण तुम्ही हो
केवल वीर
होगा अगर रण
तुम पर प्रहार करते वक्त
नीर बहाएगा पाण्डव तत्क्षण
बात हुई फलित
कुरुक्षेत्र में महाभारत का
युद्ध हुआ घटित
विकर्ण का सिर कटा
युद्ध जैसे एक पल हो डटा
देख दृश्य
केशव का कलेजा फटा
धर्म का वो पहला प्रहरी था
वो कौन था?
वो कौन था?
वो और कोई नही कौरव था
नाम जिसका विकर्ण था
जिस पर समस्त हस्तिनापुर को
आज गौरव था।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)


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