Prani Ka Pran Hoon Mai–प्राणी का प्राण हूं मैं
प्राणी का प्राण हूं मैं
प्राणियों में प्रेम जगाएं वो नाद हूं मैं
जठराग्नि को शान्त करे वो प्रसाद हूं मैं
दर्द को कम करे वो मरहम हूं मैं
प्राणी का प्राण हूं मैं
सब प्राणियों को जो गले लगाएं सखा हूं मैं
शबरी के झूठें बैर का परम प्रसाद पाने वाला राम हूं मैं
काग भूषण्डी के प्रेम पे जो रीझे वो करूणानिधान हूं मैं
प्राणी का प्राण हूं मैं
राजा बलि के दान पर प्रसन्न होकर बनने वाला द्वारपाल हूं मैं
शीश के दानी में समाहित होने वाला श्याम हूं मैं
उदारता से जो सबका उद्धार करे वो नारायण हूं मैं
प्राणी का प्राण हूं मैं
प्राणी –प्राणी में अन्तर को मिटा दे वो चेतना हूं मैं
क्रुद्ध को प्रबुद्ध कर दे वो चिरंजीवी ज्ञान हूं मैं
तू है मेरी ही संतान
विचारधारा को मतभेद बना कर
मत पैदा कर एक दूसरे के बीच व्यवधान
कर तू मुझे गले लगाकर शांति के पथ पर प्रस्थान
तेरे साथ सदा रहने वाला बुद्ध हूं मैं
प्रकृति को रहने योग्य बना दे वो बागबान हूं मैं
अन्तर को मिटाने वाली अन्तर दृष्टि हूं मैं
जो नजर से भी नजर ना आए वो वो अन्नत सृष्टि हूं मैं
मैं ही तेरे भीतर की दृष्टि और दृष्टा हूं मैं
प्राणी का प्राण हूं मैं
परम पिता परमात्मा हूं मैं।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)



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