Mat Kahe Anshi Mere! Mai Tujh Se Milta Nahin -मत कहे अंशी मेरे ! मैं तुझ से मिलता नहीं
मत कहे अंशी मेरे!
मैं तुझ से मिलता नहीं
दुःख के सैलाब में
जब –जब डूबता है तू
करने को हल्का
देर नहीं लगाता एक पल का
अश्रु की बूंद में
क्षीर सागर से निकलने वाला
मैं ही मैं हूं
मत कहे अंशी मेरे!
मैं तुझ से मिलता नहीं
चाहे आरम्भ हो
तेरे रोने की किलकारी
सुन कर
तेरी भूख और प्यास को शान्त करने
मां के वक्ष स्थल से दुग्ध की धार
मैने ही उतारी
मत ले इम्तिहान मेरा
मेरे इर्द गिर्द लगता है तेरा डेरा
तेरी दिन चर्या को ढालने
मैं ही करता संध्या और सवेरा।
मत कहे अंशी मेरे !
मैं तुझ से मिलता नहीं
चाहे अन्त हो
और हो रही हो
तेरे तन में सघन पीड़ा
अपने में समाहित करने को
प्राण वायु को
भीतर पहुंचने से रोक कर
अपने में समाहित करने का
मैं ही उठाता हूं बीड़ा
अनवरत चलती रहे
जन्म और मृत्यु की क्रीड़ा
मत कहे अंशी मेरे !
मैं तुझ से मिलता नहीं
मैं तुझ में
तू मुझ में
आरम्भ से अन्त
सफर करते हैं
एक – दूजे के संग– संग
अनन्त ही अनन्त ।।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)



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