Badla - बदला
एक भूखा सिंह
तेरी ओर आ धमका
बांस का बांस से टकराने से
एक जंगली जानवर
आग में आ फंसा
वो जला
फिर पक्का
तूने अपनी जठराग्नि को
शान्त करने के लिए
उसे चखा
तेरे को स्वाद लगा अच्छा
कंद मूल खाना छोड़
जंगली जानवरों को
मारकर खाने की
मनुष्य प्रजाति में मची होड़
खानाबदोश जीवन को दिया तूने छोड़
कंदराओं को बनाया अब अपनी ठौर
धीरे धीरे तेरी बढ़ी संतान
नाव को बनाकर
धरती के अलग अलग स्थानों
में रहने के लिए किया तूने प्रस्थान
मैदानी भूभाग को
बनाया अपना निवास स्थान
बना फिर तेरा कबीला
तू बना उसका सरदार
दूर बसे कबीले पर
तूने तरकश से पहला किया हमला
पीड़ित के दिल में घर कर गया
एक दिन मुझे लेना होगा बदला
आया एक दिन तूफान
बदला भर रहा था
भीतर ही भीतर उफान
अपने समूह में से चुना अपना सरदार
सिंहनाद हुआ
ओह, कायर!
तू छुपा है कहां?
सिंह तुम्हे ललकार रहा
सोच क्या रहा?
थमा नहीं बदला
तेरे हमले से
मैं हूं आज बदला
किया कभी तूने
मुझ पर कायराना हमला
लहू से था मैं था सन्ना
करके मुझ पर प्रहार
बैठ कर महफिल में
हंस हंस कर खा रहा था तू गन्ना
आज मेरी बारी
देनी तुझे चोट करारी
निकल जाएगी
हेकड़ी बाहर तेरी सारी
मची दोनों समूहों में
भीषण मारा मारी
मानवता आज हारी
बदले की भावना पड़ गई
भारी बहुत भारी
घर कर गई बात खारी
थमा नहीं तेरा बदला
सदियों से बदला नहीं इंसान
हथियार से हत्या कर
कह रहा अपने को बलवान
कह रहे आज भगवान !,
" तू बदला तो बदला भी बदला ,
वरना नासूर बनेगा तेरा बदला
लेता रहेगा पीढ़ी दर पीढ़ी बदला ।"
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)


Comments