Charachar Hai Anam- चराचर है अनाम



चराचर है अनाम 

कोख से निकला तू

अपने – अपने पंथ से पाया तूने नाम

नाम में संसार उलझा 

देने लगा छोटे और बड़े का दर्जा 

नाम है माया

चराचर को हर पंथ ने उलझाया 

प्रेम से कैसे रहा जाता है? 

अनाम होकर

अनाम का बन जा 

एक रूप हुई

जड़ और चेतना

अनाम में खोजा

अनाम ने अनाम को दिया नाम

दूर कर सके 

चराचर की वेदना तमाम

आज जल रहा है नाम

लगा रहा है मिटाने के लिए दाम 

नाम ने ही खोजा

गोला और बारूद

एक नाम

दूसरे नाम को मिटाने के लिए

बरसा रहा है एक दूसरे पर 

सुबह और शाम

नाम  को छोड़ बन्दे !

हो जा अब तू अनाम

चराचर  बन जाएगा परम धाम

अनाम में डूबकर 

निद्रा में होकर लीन

समझ रहा क्यों ?

अपने को दीन 

निद्रा के लिए 

खदानों में हो रही

सोने –चांदी और हीरे– मोती की

सदियों से मानव द्वारा खोज बीन

अनाम में मिल रही सब प्राणियों को निद्रा

अनाम अनंत को

क्यों खोज रहा तू कंदरा –कंदरा 

सदियों से पीढ़ियां करती आई

अनाम में अनन्त के दर्शन

निद्रा में अनाम को 

पाकर होती आई  है प्रसन्न 

चराचर है अनाम

जो अनाम हो

दुनिया असमर्थ है

देने में उस परम को कोई नाम

कैसे कर सकेगी

अनाम पथ गामी को भला कैसे

सम्मानित और बदनाम ?

बदनाम करने के लिए

संसार से उधार 

लेना पड़ता है

कोई ना कोई नाम

चराचर है अनाम 

जिन्हें पाने के लिए

नहीं चाहिए 

माया का कोई तामझाम 


मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)

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