Hath Pakdo Mere Nath - हाथ पकड़ो मेरे नाथ
हाथ पकड़ो मेरे नाथ !
नहीं होना चाहता मैं अनाथ
सत्य खड़ा बाजार में अकेला
मारने को उसे बैठा असत्य लगा कर घात
हाथ पकड़ो मेरे नाथ !
बात अब बात नहीं रही
तात की गोद में जाकर
कैसे बैठूं मैं
जो पढ़ा रहा हैं असत्य का पाठ
कह रहा है
करूंगा अगर असत्य का अनुसरण
जीवन में होगा मेरे ठाट –बाट
हाथ पकड़ो मेरे नाथ !
दे दो मेरा साथ
चला मैं आपकी ओर
जग की सुख सुविधाओं को
मार कर अंगद सी लात
बनो आप मेरे तात !
जो सिखाए मुझे
तृष्णा को संतोष धन से
कैसे दिया जाता है मात ?
आओ ! दौड़कर मेरे नाथ
विकराल रूप धर
नर भी आज पैशाच
बन कर घूम रहा
निर्दोषों का जीवन लील रहा
करके मासूम बच्चों को
वो अपने भीषण प्रहार से अनाथ
सत्य की नींव रखो !
सकल जगत के नर और नारी में
हो उनकी गिनती
हे नाथ ! आपके चाहने वालों में
नफरत का बारूद हो
चहुं दिशाओं में चकनाचूर
गले मिल कर सर्व जन
भीतर करे शांति का सृजन
खत्म होगी बारूद की ऊपर से बरसात
दौड़ेंगे खिलाने को
सकल मानवता को
अपने हाथों से बनाया हुआ
स्वादिष्ट व्यंजन
हो रहा चहुं दिशाओं में
शांति का नाच
भीतर से करके साफ
दुनियां में बढ़ाया
आप ही ने शांति का ग्राफ
नहीं दे रहा कोई
रण की ललकार
पा रहे हैं एक दूसरे से सत्कार
कह रहा है सकल संसार
हाथ पकड़ो मेरे नाथ !
नहीं होना चाहता मैं अनाथ
देना नाथ !
दिया और बाती जैसा साथ
मन का भेद मिटे
सीमाओं से परे
निर्भय रहें
सकल जगत
अमन की नींद में भरे
अपनी करवटें
मिट जाएं मत भेद की
जो बना रखी थी
दिलोदिमाग में सदियों से सलवटें ।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)


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