Hormuze Kare Pukar - हॉर्मूज करे पुकार
हॉर्मूज करे पुकार
मुझ में बसा सकल संसार
हो किसी एक का अधिकार
मुझे नहीं स्वीकार
इंसान है तुझे धिक्कार
बसा दिया मेरे ईर्द गिर्द बारूद का बाजार
कालाबाजारी को मत बना व्यापार
गुंजित होती है इसमें गरीबों की चित्कार
विश्व युद्ध में है नहीं कोई सार
ढाढस धार
बातचीत बनेगी
शान्ति का आधार
होगी नहीं इसमें किसी की हार
हॉर्मूज नहीं बनेगा पर्ल हार्बर
ईश्वर की है इंसान से दरकार
शीघ्र निकाल समाधान
मनुष्य का मनुष्य से
गले मिलने में कैसा है व्यवधान
ईश्वर ने तुझे मनुष्य बनाया
बड़ा सोच –विचार
खारे पानी पे खड़ा हो के
कर सके एक दूसरे के लिए
सुख–समृद्धि का प्रचार और प्रसार
हे ईश्वर!
हॉर्मूज करे पुकार
इंसान को सम्भाल
सम्भल नगरी बसा
भीतर इसके
चार दिन की जिंदगी को
संग –संग
बिना संघर्ष के जी सके
हर मां
अपने नौनिहाल के मुख में
डाले गुड़ की डली
कोई भी आज कल और आज
चढ़ ना पाए कलि पुरुष की बलि
मिटेगी चारों तरफ तनातनी
हॉर्मूज को मुक्त रखने में
स्वप्न में नहीं करेगा आनाकानी
जिसमें हो मानवता की हानि
ऐसी नहीं बोलेगा अपनी वाणी।
मौलिक रचयिता:– नरेन्द्र सिंह राठौड़ (भारत)


Comments